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मैं चढ़ता रहा मोहब्बत की सीढ़ियों से

मैं चढ़ता रहा मोहब्बत की सीढ़ियों से मंजिल कितनी दूर है आज तक समझ नहीं पाया वह इशारे कर के बुलाती  रही यूं ही चलते चलते वर्षों गुजर गया मंजिल कितनी दूर है आज तक समझ नहीं पाया